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मित्रता

दो हृदयों के नि:स्‍वार्थ भाव से मिलने का नाम मित्रता है। तथा सच्‍चा मित्र किसे कहा जाए इस प्रश्‍न का बडा ही सुन्‍दर उत्तर संस्‍कृत साहित्‍य के बडे ही महनीय विद्वान् महाराज भर्तृहरि ने प्रस्‍तुत श्‍लोक के माध्‍यम से जनमानस को सम्‍बोधित करते हुऐ कहते है कि

पापान्निवार‍यति योजयत हिताय

गुहां निगू‍हति गुणान्‍प्रकटी करोति।

आपद्गत्ं च न जहाति ददाति काले

सम्मित्र लक्षणमिद प्रवदन्ति सन्‍त:।

वे कहते हैं कि सच्‍चा मित्र वही है जो अपने मित्र को पापों से बचाते हुये उसे परोपकार के कार्यो में लगाए तथा छुपाने योग्‍य बातों को छुपाये ओर उसके गुणों को प्रकट करें संकट काल में कभी उसका साथ न छोड़े और आवश्‍यकता पड़ने पर तन मन धन से उसकी सहायता भी करे वही सच्‍चा मित्र है।

मनुष्‍य सामाजिक प्राणी है। वह चाहता है कि जीवन में उसका ऐसा कोई साथी हो जो दु:ख और सुख में सदा उसका साथ दे जिसको अपने सुख और दु:ख की सभी बाते नि:संकोच कह सकें। अतएव आवश्‍यकता होती है कि मनुष्य का कोई मित्र अवश्य होना चाहिये मित्र का निर्णय करते समय इस बात का अवश्य ध्यान रखना चाहिये कि वह स्वार्थी न हो दुर्जन न हो और वंचक न हो । सच्चा मित्र वही है जो बड़ी से बड़ी विपत्ति में भी साथ न छोडे। दु:ख में साथ दे और सुख में प्रसन्‍न हो सदा उत्तम सम्‍मति दे कुमार्ग से हटाकर सन्‍मार्ग पर लावे। विपत्ति आ पड़्ने पर धन आर अपने प्राणों से भी सहायता करे। दुर्जनों से कभी भी मित्रता ना करें। सदा सज्‍जन से ही मित्रता करे समान आयु समान बल और समान गुणवालों की ही मित्रता स्‍थायी होती है। हमें ऐसे ही मित्रों के खोज में रहना चाहिए जिसमें हम से अधिक आत्‍म बल हो मित्र हो तो प्रतिष्ठित शुद्ध हृदय के हो मृदुल और पुरूषार्थी हो शिष्‍ट ओर सत्‍यनिष्ठ हो जिससे हम अपने को उनके भरोसे छोड सकें और यह विश्‍वास कर सकें कि उनसे किसी प्रकार का धोखा नही होगा। और ऋग्वेद की एक सूक्ति संन्‍देश देती है (मित्रं कृणध्‍वम) हमारे अधिक से अधिक मित्र हों। जिससे कि हम सदा सुरक्षित रह सकें ।